Gulajar sab ki shayri in hindi, गुलज़ार साहब की शायरी
हाँ बदनाम तो बहुत है इस ज़माने में,
तू बता तेरे सुनने में कौन सा किस्सा आया है।
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मां ने जिस चांद सी दुल्हन की दुआ दी थी मुझे
आज की रात वह फ़ुटपाथ से देखा मैंने
रात भर रोटी नज़र आया है वो चांद मुझे
गुलज़ार साहब
***//2//***
जिस्म सौ बार जले फ़िर वही मिटटी का ढेला
रूह एक बार जेलेगी तो वह कुंदन होगी
रूह देखी है ,कभी रूह को महसूस किया है
गुलज़ारसाहब
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डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुँचे
दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन
जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आए
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको
मौत तू एक कविता है ।
गुलज़ार साहिब
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मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे,
अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते,
जब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआ
फिर से बाँध के और सिरा कोई जोड़ के उसमें
आगे बुनने लगते हो तेरे इस ताने में लेकिन
इक भी गाँठ गिरह बुनतर की
देख नहीं सकता है कोई
मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ़ नज़र आती हैं मेरे यार जुलाहे
गुलज़ार साहब
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मैंने दबी आवाज़ में पूछा:
“मोहब्बत करने लगी हो..
नज़रें झुका कर वो बोली: "बहुत"
गुलज़ार साहब
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अपनी धडकनों से कहो थोड़ा आहिस्ता चले,
उनको सुन कर मेरे दिल की बेचैनी बढ़ जाती है।
अपने जुल्फों को यूं खुला मत छोड़ा करो तुम,
तुम्हें अपने बाहों में समेटने की खयाल आ रहा है।
गुलज़ार साहब
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